नव राष्ट्र मीडिया
पटना।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 10 वर्ष पहले मछुआरों को एक रूपये टोकन पर सरकारी तालाबों को देने का वादा किया था, लेकिन 10 वर्षो में अपनी वादा पूरा नहीं कर सके। मछुआ समाज नौकरशाही का शिकार हो रहा है। मत्स्य विभाग के अधिकारी तालाबों की बंदोबस्ती और राजस्व के नाम पर मछुआरों से लाखों रूपये का दोहन कर रहे है।
बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ (काॅफ्फेड) के प्रबंध निदेशक, ऋषिकेश कश्यप ने कहा की सरकार द्वारा निर्धारित राजस्व का पांच से छह गुणा राशि जिला मत्स्य अधिकारी द्वारा वसूल किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने 10 जुलाई, 2013 मछुआरा दिवस के अवसर पर एक रूपये टोकन पर सरकारी तालाबों को बंदोबस्त करने की घोषणा की थी। इससे मछुआरों को काफी आशा जगी थी। राज्य सरकार उन्हें आर्थिक दोहन एवं शोषण से बचायेगी परंतु राज्य सरकार ने गरीब मछुआरों को धोखा देकर, उनकी गरीबी और बदहाली का मजाक उड़ाती रही। परंतु अब मछुआ समाज जागरूक हो गया है और अपने हक और अधिकारों के लिए सड़क पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव का विशेष महत्व है, ऐसे में मछुआ समाज ने निर्णय लिया है कि आगमी चुनाव में मछुआ राज्य के मुख्यमंत्री एवं मछुआ विरोधी राजनीतिक दलों को सबक सिखायेगा। जो राजनीतिक दल मछुआ समाज को धोखा दिया है। मछुआ समाज उन्हें मुहतोड़ जबाब देने का निर्णय लिया है।
मालूम हो कि मछुआ समाज मुख्यमंत्री से बार-बार आग्रह करते रहा परंतु उन्होंने कभी भी मछुआ समाज की बातों पर ध्यान नहीं दिया। राज्य सरकार ने मछुआ आयोग के गठन की बात कही थी लेकिन वर्षों से मछुआ आयोग भंग है। यह मछुआरों को अपनी बात कहने का एक अच्छा मंच था। जहां मछुआ समाज का कोई भी सदस्य आसानी से पहुंचकर अपनी बात कहता था और आयोग उसकी बातों को गंभीरता पूर्वक सुनने के बाद उस पर समुचित कार्रवाई करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देता था। परन्तु आयोग के भंग होने से अधिकारियों की तानाशाही काफी बढ़ गई है। गरीब और असहाय मछुआरों की बातों को अब सुनने वाला कोई नहीं है। मछुआ अपनी समस्याओं को लेकर जिले से लेकर सचिवालय तक भटक रहें है, उनकी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है। परंतु जल्दी ही बदली हुई तस्वीर नज़र आयेगी और मछुआरा समाज अपनेे अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क पर नज़र आयेगा। इस अवसर पर ब्रजेन्द्र नाथ सिन्हा, निदेशक काॅफ्फेड, जय शंकर तथा रवीन्द्र कुमार उपस्थित थे।

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