स्कीम वर्करों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू, सरकारी कर्मचारी का दर्जा की उठी मांग

देश के विभिन्न राज्यों से तकरीबन 600 स्कीम वर्करों की हो रही भागीदारी

स्कीम वर्करों को सरकारी कर्मी का दर्जा व उनके मान-सम्मान की गारंटी की उठी मांग

नव राष्ट्र मीडिया
पटना ।पटना के गेट पब्लिक लाइब्रेरी में ऑल इंडिया स्कीम वर्कर्स फेडरेशन के बैनर तले देशभर के स्कीम वर्करों का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आज से शुरू हो गया. सम्मेलन का उद्घाटन भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने किया. मौके पर ऐक्टू के महासचिव का. राजीव डिमरी, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, माले विधायक दल के नेता महबूब आलम, मंजू प्रकाश, मीरा दत्त आदि ने भी सम्मेलन को संबोधित किया और स्कीम वर्करों की मांगों व उनके आंदोलनों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया. सरोज चौबे द्वारा सम्मेलन की ओर से सभी अतिथियों को सम्मानित किया गया. माले के अधिकांश विधायक और विभिन्न जनसंगठनों के नेता मंच पर उपस्थित थे.

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए माले महासचिव ने कहा कि स्कीम वर्करों में बड़ी आबादी महिलाओं की है, जिन्हें मजदूर और महिला होने के कारण दुहरी मार का सामना करना पड़ रहा है. देश में कानून बने हुए हैं लेकिन काम की जगह पर महिलाओं के सम्मान व सुरक्षा से खिलवाड़ हो रहा है. मजदूरों की बात तो छोड़ ही दी जाए अंतर्राष्ट्रीय पहलवानों के साथ भी न्याय नहीं हो रहा है. दूसरा कानून महिला मजदूरों के लिए काम में बराबरी का है. लेकिन महिला मजदूरों को एक ही काम के लिए पुरुष मजदूरों की तुलना में आज भी कम वेतन मिलता है. यह बदस्तूर जारी है. लेकिन इसे अब बर्दाश्त करने के लिए महिलाएं तैयार नहीं हैं, वे इसे बदल देने के लिए आगे बढ़ रही हैं.

बिहार में आशाकर्मियों ने लड़कर जीत हासिल की. आशाकर्मियों, रसोइया, आंगनबाड़ी और अन्य स्कीम वर्करों में जो लड़ने की ताकत है, उसे और बढ़ाने की जरूरत है. मोदी जी हर दिन नए-नए किस्म के स्कीम की घोषणा करते हैं, लेकिन स्कीम वर्करों को सम्मान नहीं देते. इसलिए देश के स्तर पर स्कीम वर्करों की यह बन रही एकता बहुत ही सराहनीय पहल है और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह तस्वीर बदलेगी और वे संगठित होने लगी हैं.

ऐक्टू महासचिव राजीव डिमरी ने कहा कि देशभर में तकरीबन 1 करोड़ स्कीम वर्कर्स हैं जिनको शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल संरक्षण अभियानों में नियुक्त किया गया था. इनमें 98 प्रतिशत महिलाएं हैं. इन कामकाजी महिलाओं को मोदी सरकार के 9 वर्षों के कार्यकाल में उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा है. इनके वेतन और भत्ता में कोई वृद्धि नहीं हुई है जबकि इन स्कीम वर्कर्स ने जान जोखिम में डालकर कोरोना काल में देश की सेवा की थी. आज हालत तो यह है कि मजदूरों के अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही है और गुलामी के कानून लाद दिए गए हैं. इसके खिलाफ चौतरफा लड़ाई जारी है.

ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी ने भी सम्मेलन को अपनी शुभकामनाएं दी और मोदी सरकार के हमले के खिलाफ एक व्यापक एकता बनाने का आह्वान किया. इसके पूर्व फेडरेशन की संयोजक शशि यादव ने कहा कि आज पूरे देश में स्कीम वर्कर्स का आंदोलन तेज है. बिहार ने 32 दिनों की सफल और शत-प्रतिशत हड़ताल से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. हरियाणा में हड़ताल चल रही है और भाजपा सरकार दमन ढा रही है. यूपी हड़ताल की बड़ी तैयारी में है. दिल्ली में स्वतंत्र अथवा ट्रेड यूनियंस के संयुक्त पहल पर महा पड़ाव आयोजित हुए हैं.

सम्मेलन में मुख्यतः आशाकर्मियों, रसाईया और अन्य स्कीम वर्करों का जुटान होगा. सम्मेलन में महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तराखंड, यूपी, झारखंड, असम, बंगाल, आंध्र, ओडिशा आदि राज्यों के करीब 600 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं.

मौके पर ऐक्टू के राष्ट्रीय अध्यक्ष वी. शंकर, भाकपा-माले के वरिष्ठ नेता स्वदेश भट्टाचार्य, राज्य सचिव कुणाल, बिहार महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मंजू प्रकाश, आइलाज की मंजू शर्मा, ऐक्टू के बिहार महासचिव आरएन ठाकुर, दिल्ली से आशा कामगार यूनियन की नेता श्वेता राज, एआइसीडब्लूएफ के नेता एस के शर्मा, तलाश पत्रिका की संपादक मीरा दत्त सहित कई लोग उपस्थित थे.

सम्मेलन से आशा, रसोइया, मिड डे मील वर्कर सहित सभी स्कीम वर्करों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने, मोदी सरकार की जुमलेबाजी की जगह स्कीम वर्करों के हक-अधिकार व मान-सम्मान की गारंटी करने आदि की मांगें प्रमुखता से उठाई गई.

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