धर्म आधारित राजनीति, हिंदूवादी नीतियों के सहारे राजनीति चलाने वाले दलों को भी धक्का लगेगा
चंद पिछड़ी जातियां, अल्पसंख्यकों, दलितों को अपने नये ताकत का एहसास होगा
बिहार में संख्या बल में मजबूत जातियां सत्ता में अधिक हिस्सेदारी मांगेंगी
नौकरी में अधिक हिस्सेदारी मांग होगी , इससे नए सिरे से जातीय तनाव भी बढ़ सकता है
जिसकी जितनी संख्या भारी , उसकी उतनी हिस्सेदारी के फार्मूले को लागू कराने की जिद बढ़ेगी
कई जिलों में जातीय टकराव तनाव भी बढ़ेगा, मजबूत जातियों की रंगदारी बढ़ेगी

विश्वपति
नव राष्ट्र मीडिया
पटना।

बिहार में जातीय जनगणना का कार्य फिर से शुरू हो गया है और माना जा रहा है कि नवंबर माह के अंत तक इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी जाएगी और उसका प्रकाशन भी कर दिया जाएगा । लेकिन इस रिपोर्ट का बिहार के समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका आकलन भी शुरू कर दिया गया है।
तटस्थ और निष्पक्ष लोगों का मानना है कि पहले से मजबूत और दबंग जातियों का वर्चस्व इस रिपोर्ट के बाद और भी बढ़ जाएगा , क्योंकि निश्चित तौर पर उनकी संख्या बल में इजाफा होगा। आर्थिक रूप से मजबूत जातियां कम संख्या बल के बाद भी प्रतिकार में अपना नया जुझारू रूप दिखाएंगी । इससे जातीय तनाव, टकराव होने की घटना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है ।
मंडल वादी राजनीति का प्रभाव बढ़ेगा। यानि जातिवादी पार्टियों का जोर पुनः बिहार में बढ़ सकता है। यादव कुर्मी ,राजपूत, भूमिहार,बनिया, ब्राह्मण ,निषाद, कोइरी, चमार, पासवान आदि के अलावा लगभग डेढ़ दर्जन अन्य जातियां भी संख्या बल के आधार पर अपना वर्चस्व नए सिरे से बनाने का प्रयास करेंगी। हालांकि इतना तो तय है कि अब जातीय राजनीति का बोलबाला और बढ़ेगा तथा धर्म आधारित राजनीति को गहरा धक्का लगेगा । पिछड़े, अत्यंत पिछड़े ,दलित जातियां सवर्ण नेतृत्व के पीछे चलने में इंकार भी कर देंगी ।
कुछ समाजशास्त्रियों ने ऐसी भी आशंका प्रकट की है कि वर्ष 1990 में मंडल आयोग के अनुशंसा को लागू करने के बाद जो माहौल देश में बना था । कमोबेश वैसा ही माहौल बिहार में बनाने का प्रयास किया जाएगा। आने वाले चुनाव को देखते हुए ध्रुवीकरण की इच्छा रखने वाली पार्टियां ऐसा जरूर करेंगी ।
देखना है सरकार संभावित जातीय तनाव से कैसे निपटती है , क्योंकि इतना तो तय है कि जिन जातियों की आबादी, उनकी जनसंख्या अधिक निकल कर सामने आएगी, उनका वर्चस्व उनकी रंगदारी और भी मुखर हो जाएगी । खासकर चिन्हित जिलों और इलाकों में तनाव तो जरूर बनेगा। वैसे सूरत में उनको संभालना सरकार और पुलिस के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा । उन जातियों में नया जोश खरोश ,नई दबंगता ,नई लंठई का भी प्रादुर्भाव होगा।
सामान्‍य प्रशासन विभाग से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार, 26 नवंबर यानी संविधान दिवस के मौके पर सरकार जाति आधारित गणना यानि सर्वे रिपोर्ट जारी करेगी। इस बीच कोई न्‍यायिक अड़चन नहीं आयी तो सर्वे रिपोर्ट पहले की भी जारी हो सकती है। यह भी एक विचित्र बात सामने आई है कि सरकार ने कोर्ट को बताया है कि जातियों का सर्वे हो रहा है । लेकिन उसके सभी आदेश जनगणना के संबंध में जारी किए गए हैं। जनगणना शब्द का उल्लेख भी किया गया है। शायद इस विसंगति पर रिट याचिका दाखिल करने वाले तथा खुद न्यायाधीशों की नजर नहीं पड़ी है।
सरकार की ओर से अब यह कहा जा रहा है कि सर्वे रिपोर्ट में जातिवार व्‍यक्तियों की संख्‍या नहीं बतायी जाएगी और न कोई प्रतिशत में जाति के आंकड़े जारी किये जाएंगे। संसाधन और अवसर पर जातिवार हिस्‍सेदारी के आंकड़े प्रतिशत में जारी किये जाएंगे। लेकिन व्यवहारिक तौर पर जो काम हुए हैं, उसमें सभी जाति के प्रत्येक परिवार के सभी सदस्यों के संबंध में मुकम्मल सूचना इकट्ठा कर ली गई है। इसको अगर निजता के अधिकार का उल्लंघन भी माना जाए, तो सही होगा क्योंकि कई सूचनाएं गणना करने वालों ने पूछ पूछ कर निकाल लीं। सीधे-साधे लोगों , आम ग्रामीणों ने किसी सरकारी फायदे की संभावना के मद्देनजर उनको पूरी बातें अंदरूनी बातें साफतौर को बता दी है।
इसका दुरुपयोग भी आने वाले दिनों में संभव है।
आम लोग से लेकर‌ गंभीर राजनीतिक विश्लेषक भी यह समझते हैं की गणना में मिले डाटा का तथा व्‍यवहार में इन आंकड़ों का विकास की योजनाओं से कोई लेना-देना नहीं है।
जैसे आज भी 15 फीसदी अनुसूचित जाति के जातिवार आंकड़े हर जनगणना में एकत्रित किये जाते हैं। लेकिन पिछले 77 सालों में इन जातियों को कितना लाभ हुआ , यह बात सब जानते हैं। पिछड़ा, अति पिछड़ा ,दलित जातियां में कुल मिलाकर दर्जनभर जातियां ही तमाम फायदों को उठा रही हैं । आरक्षण का लाभ भी चुनिंदा प्रमुख पिछड़ी और दलित जातियों को मिलता है।
गणना के आधार पर बिहार या किसी भी सूबे में अनुसूचित जाति के लिए जातिवार योजनाओं का निर्माण नहीं किया जाता है। नई गणना के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा, क्योंकि भ्रष्ट अफसरशाही, नौकरशाही और राजनेताओं का सिंडिकेट किसी भी कल्याणकारी योजना को जमीन पर उतरने नहीं देता है। हर योजना की 90 फ़ीसदी राशि तक लूट ली जाती है। उसका कागजों पर कार्यान्वयन हो जाता है। गबन हो जाता है । यह बात सब लोग जानते हैं।
जातीय गणना के बाद दलितों, अति पिछड़ा तथा कुछ दबंग पिछड़ी जातियों की संख्या बल में इजाफा होगा। यही हाल धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों का भी रहेगा। जिसका भय हिंदूवादी पार्टियों को है।
जाति आधारित गणना के आंकड़ों का सिर्फ राजनीतिक इस्‍तेमाल होगा। सभी जातीय नेताओं को अपने कुल वोटरों की जानकारी हो जाएगी और इस आधार पर वह नए सिरे से शक्ति प्रदर्शन करने लगेंगे।
वास्तव में सपा , राजद, झामुमो ,जदयू, बसपा आदि तमाम जातिवादी राजनीतिक दलों की स्थापना ही जातीय सोच के तहत हुई थी। किसी भी दल की समग्र सोच नहीं थी। वह अपने इर्द-गिर्द के कुछ चुनिंदा जातियों के उत्थान की बात करते थे।
वस्तुतः ये दल मंडल आयोग की अनुशंसाओं के कारण है अधिक फल फूल सके । मंडल आयोग के अनुशंसा को लागू करने के बाद देशभर में जो पिछड़ी जातियों का नया उभार शुरू हुआ था । उसके कारण भी ऐसी पॉलिटिकल पार्टी को पनपने और आगे बढ़ने में काफी सुविधा मिल गई।
तब से लेकर अब तक जाति आधारित इन पार्टियों के कामकाज का मुख्य एजेंडा भी रही रहा। स्थापना का मुख्य आधार ही चंद्र प्रमुख जातियों का समीकरण बिठाना रहा है। इसीलिए आम जनता में यही धारणा है कि जातियों की संख्या का पता होने के बाद ये दल कोई भी नया कल्याणकारी कार्य नहीं करेंगे । बस उस जाति के साथ अपना समीकरण बनाने , गोटी बिसात बिछाने का काम करेंगे।
अभी भी बिहार की प्रमुख राजनीतिक दलों को कुछ जातियों के समर्थन से ही जोड़कर देखा जाता है। उसमें काफी सच्चाई भी है। जैसे राजद को यादव मुसलमान की पार्टी। जदयू को कुर्मी कोईरी लव-कुश की पार्टी । भाजपा को बनिया ब्राह्मण, सवर्णों की पार्टी माना गया । यह काफी हद तक सच के निकट भी रहा।
इसलिए इन दलों को विश्वास है कि जाति जनगणना से पिछड़ी, अत्यंत पिछड़ी जातियों की संख्या के बारे में नई जानकारी मिलेगी। इससे उनको अपने जाति आधारित पॉलिटिक्स करना आसान हो जाएगा। सीधे कहा जाए तो बिहार में सवर्णों की राजनीति अब पुनः कठिन हो जाएगी।
यह कहना भी सही है कि जाति आधार गणना के शर्त पर ही महागठबंधन सरकार का जन्‍म हुआ है। जाति आधारित गणना को महागठंधन के नेता भाजपा के खिलाफ अपना अचूक हथियार मानते हैं। उन्‍हें लगता है कि भाजपा के वोटों के खिलाफ दूसरी अत्यंत पिछड़े, दलित आदिवासियों की गोलबंदी संभव है। इसलिए मंडल आयोग के बाद से ही अपने स्टैंड पर वे अब तक कायम है।
भाजपा ने अप्रकट तौर पर जातीय जनगणना का एक प्रकार से विरोध ही किया है। भले अपने कुछ नेताओं से वो इसके पक्ष में बयान दिलवाते रहे हैं ।
लेकिन उनके समर्थक ही हाई कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट में गणना को रुकवाने के लिए चले गए । यह बात सर्वविदित है।
जातिगणना को लेकर भाजपा के अंदर भी मतभेद संशय और घबराहट दिखाई देने लगी हैं। जातीय गिरोह बंदी भी शुरू हो गयी है। भाजपा के सवर्ण नेता इसे विभाजनकारी मानते हैं, जबकि पिछड़ी जाति के नेता खुलेआम इसके समर्थन में है। इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जा‍तिगणना के मुद्दे पर भाजपा भी सरकार के साथ है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्‍या गैरसवर्ण और गैरबनिया जातियों का भरोसा महागठबंधन के साथ कायम है।
सवर्ण और बनिया भाजपा के साथ हैं। पिछड़ी जातियों को जोड़ने के लिए भाजपा लगातार प्रयास कर रही है। इस प्रयास में उसे आशा अनुरूप सफलता भी मिल रही थी। लेकिन रिपोर्ट आने के बाद यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि पिछड़ी जातियां भाजपा के साथ ही रहेंगी ,क्योंकि भाजपा में वैसे भी सवर्णों और बनियों का ही बोलबाला रहा है।
भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव को हिंदुत्व के नाम पर लड़ना चाहती है । भारत के विभिन्न हिस्सों में हुए दंगे फसाद के बाद उत्पन्न भावुक माहौल को भी भुनाना चाहती है । इसके लिए उसे सभी पिछड़ी, अत्यंत पिछड़े, दलित जातियों का समर्थन जरूरी है। लेकिन बिहार के जनगणना के बाद अन्य सूबों में भी ऐसी जनगणना की मांग तेज हो गई है। अगर यह मांऐ तेज हुई तो इसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ेगा।
यह बात सही है कि पिछड़ों, दलितों के नाम पर राजनीति हर पार्टी कर रही है, लेकिन उनको हिस्‍सेदारी देने को कोई तैयार नहीं है।
वजह है कि अति पिछड़ी जातियां गिनाऊ बहुत हैं, पर जिताऊ नहीं। उन छोटी-छोटी जातियों में संख्या बल की भी कमी है और आर्थिक मजबूती भी नहीं है। इस कारण वे वोट डालने की स्थिति में भी कई बार कारगर नहीं होते हैं। जातीय गणना की रिपोर्ट के बाद क्या नया जाति समीकरण बनता है, उसका किस दल को कितना फायदा होता है। महागठबंधन को कितनी ताकत देता है। यह तो समय बताएगा।
लेकिन इतना तो तय है कि जातीय जनगणना से अब बिहार में हिंदूवादी शक्तियों को धर्म के आधार पर राजनीति चलाने में काफी कठिनाई होगी । जातीय खेमे ,जातीय गिरोह मजबूत होंगे और वे धर्म के नाम पर एकजुट नहीं होंगे , बल्कि सत्ता की मलाई खाने के लिए सीधा सवर्णों, बनियों और सत्तारूढ़ दलों से टकराव मोल लेंगे।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *